ta eva paśyantyacireṇa tāvakaṃ bhavapravāhoparamaṃ padāmbujam|| 36
अर्थ
भक्तजन बार-बार आपके चरित्रका श्रवण, गान, कीर्तन एवं स्मरण करके आनन्दित होते रहते हैं; वे ही अविलम्ब आपके उस चरणकमलका दर्शन कर पाते हैं; जो जन्म-मृत्युके प्रवाहको सदाके लिये रोक देता है॥ ३६॥
शृण्वन्ति गायन्ति गृणन्त्यभीक्ष्णशः स्मरन्ति नन्दन्ति तवेहितं जनाः।
त एव पश्यन्त्यचिरेण तावकं भवप्रवाहोपरमं पदाम्बुजम्॥ ३६
भक्तजन बार-बार आपके चरित्रका श्रवण, गान, कीर्तन एवं स्मरण करके आनन्दित होते रहते हैं; वे ही अविलम्ब आपके उस चरणकमलका दर्शन कर पाते हैं; जो जन्म-मृत्युके प्रवाहको सदाके लिये रोक देता है॥ ३६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.36 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 117) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/36/