श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.37

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

अप्यद्य नस्त्वं स्वकृतेहित३ प्रभो जिहाससि स्वित्सुहृदोऽनुजीविनः।

येषां न चान्यद्भवतः पदाम्बुजात् परायणं राजसु योजितांहसाम्॥ ३७

apyadya nastvaṃ svakṛtehita prabho jihāsasi svitsuhṛdo'nujīvinaḥ|

yeṣāṃ na cānyadbhavataḥ padāmbujāt parāyaṇaṃ rājasu yojitāṃhasām|| 37

अर्थ

भक्तवाञ्छाकल्पतरु प्रभो! क्या अब आप अपने आश्रित और सम्बन्धी हमलोगोंको छोड़कर जाना चाहते हैं। आप जानते हैं कि आपके चरणकमलोंके अतिरिक्त हमें और किसीका सहारा नहीं है। पृथ्वीके राजाओंके तो हम यों ही विरोधी हो गये हैं॥ ३७॥✎ 1574

टिप्पणियाँ

  1. ३

    प्रा० प्रा० स्वकृतेहितः।

    (मुद्रित पृष्ठ 117)
इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1574 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अग्‍नि-स्वरूप → अग्‍निस्वरूप

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