श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.8.50

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 8 · अथाष्टमोऽध्यायः

नैनो राज्ञः प्रजाभर्तुर्धर्मयुद्धे वधो द्विषाम्।

इति मे न तु बोधाय कल्पते शासनं वचः॥ ५०

naino rājñaḥ prajābharturdharmayuddhe vadho dviṣām|

iti me na tu bodhāya kalpate śāsanaṃ vacaḥ|| 50

अर्थ

यद्यपि शास्त्रका वचन है कि राजा यदि प्रजाका पालन करनेके लिये धर्मयुद्धमें शत्रुओंको मारे तो उसे पाप नहीं लगता, फिर भी इससे मुझे संतोष नहीं होता॥ ५०॥✎ 70 71

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #70 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की
  • #71 शब्दोंके बीचका स्थान: भगवान् की → भगवान्‌की

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