स्त्रियोंके पति और भाई-बन्धुओंको मारनेसे उनका मेरे द्वारा यहाँ जो अपराध हुआ है। उसका मैं गृहस्थोचित यज्ञ-यागादिकोंके द्वारा मार्जन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ५१॥✎ 7071
स्त्रीणां मद्धतबन्धूनां द्रोहो योऽसाविहोत्थितः।
कर्मभिर्गृहमेधीयैर्नाहं कल्पो व्यपोहितुम्॥ ५१
स्त्रियोंके पति और भाई-बन्धुओंको मारनेसे उनका मेरे द्वारा यहाँ जो अपराध हुआ है। उसका मैं गृहस्थोचित यज्ञ-यागादिकोंके द्वारा मार्जन करनेमें समर्थ नहीं हूँ॥ ५१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.8.51 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 119) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/8/51/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)