श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.20

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

यं मन्यसे मातुलेयं प्रियं मित्रं सुहृत्तमम्।

अकरोः सचिवं दूतं सौहृदादथ सारथिम्॥ २०

yaṃ manyase mātuleyaṃ priyaṃ mitraṃ suhṛttamam|

akaroḥ sacivaṃ dūtaṃ sauhṛdādatha sārathim|| 20

अर्थ

जिन्हें तुम अपना ममेरा भाई, प्रिय मित्र और सबसे बड़ा हितू मानते हो तथा जिन्हें तुमने प्रेमवश अपना मन्त्री, दूत और सारथितक बनानेमें संकोच नहीं किया है, वे स्वयं परमात्मा हैं॥ २०॥✎ 1576

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1576 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अहंकार-रहित → अहंकाररहित

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