श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 1.9.21

प्रथम स्कन्ध · अध्याय 9 · अथ नवमोऽध्यायः

सर्वात्मनः समदृशो ह्यद्वयस्यानहङ्कृतेः।

तत्कृतं मतिवैषम्यं निरवद्यस्य न क्‍वचित्॥ २१

sarvātmanaḥ samadṛśo hyadvayasyānahaṅkṛteḥ|

tatkṛtaṃ mativaiṣamyaṃ niravadyasya na kvacit|| 21

अर्थ

इन सर्वात्मा, समदर्शी, अद्वितीय, अहंकाररहित और निष्पाप परमात्मामें उन ऊँचे-नीचे कार्योंके कारण कभी किसी प्रकारकी विषमता नहीं होती॥ २१॥✎ 1576

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1576 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: अहंकार-रहित → अहंकाररहित

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