tatkṛtaṃ mativaiṣamyaṃ niravadyasya na kvacit|| 21
अर्थ
इन सर्वात्मा, समदर्शी, अद्वितीय, अहंकाररहित और निष्पाप परमात्मामें उन ऊँचे-नीचे कार्योंके कारण कभी किसी प्रकारकी विषमता नहीं होती॥ २१॥✎ 1576
सर्वात्मनः समदृशो ह्यद्वयस्यानहङ्कृतेः।
तत्कृतं मतिवैषम्यं निरवद्यस्य न क्वचित्॥ २१
इन सर्वात्मा, समदर्शी, अद्वितीय, अहंकाररहित और निष्पाप परमात्मामें उन ऊँचे-नीचे कार्योंके कारण कभी किसी प्रकारकी विषमता नहीं होती॥ २१॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.21 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 121) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/21/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)