उस समय मुनियोंने बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णकी उनके रहस्यमय नाम ले-लेकर स्तुति की। इसके पश्चात् अपने हृदयोंको श्रीकृष्णमय बनाकर वे अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये॥ ४७॥✎ 74
तुष्टुवुर्मुनयो हृष्टाः कृष्णं तद्गुह्यनामभिः।
ततस्ते कृष्णहृदयाः स्वाश्रमान् प्रययुः पुनः॥ ४७
उस समय मुनियोंने बड़े आनन्दसे भगवान् श्रीकृष्णकी उनके रहस्यमय नाम ले-लेकर स्तुति की। इसके पश्चात् अपने हृदयोंको श्रीकृष्णमय बनाकर वे अपने-अपने आश्रमोंको लौट गये॥ ४७॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 1.9.47 · गीताप्रेस, गोरखपुर (प्रथम खण्ड, पृष्ठ 125) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/1/9/47/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)