श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.2

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

यदोश्‍च धर्मशीलस्य नितरां मुनिसत्तम।

तत्रांशेनावतीर्णस्य विष्णोर्वीर्याणि शंस नः॥ २

yadośca dharmaśīlasya nitarāṃ munisattama|

tatrāṃśenāvatīrṇasya viṣṇorvīryāṇi śaṃsa naḥ|| 2

अर्थ

राजा परीक्षित‍्ने पूछा—भगवन्! आपने चन्द्रवंश और सूर्यवंशके विस्तार तथा दोनों वंशोंके राजाओंका अत्यन्त अद्भुत चरित्र वर्णन किया। भगवान्‌के परम प्रेमी मुनिवर! आपने स्वभावसे ही धर्मप्रेमी यदुवंशका भी विशद वर्णन किया। अब कृपा करके उसी वंशमें अपने अंश श्रीबलरामजीके साथ अवतीर्ण हुए भगवान् श्रीकृष्णके परम पवित्र चरित्र भी हमें सुनाइये॥ १-२॥

यह अर्थ श्लोक 1–2 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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