श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.30

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

उग्रसेनसुतः कंसः स्वसुः प्रियचिकीर्षया।

रश्मीन् हयानां जग्राह रौक्मै रथशतैर्वृतः॥ ३०

ugrasenasutaḥ kaṃsaḥ svasuḥ priyacikīrṣayā|

raśmīn hayānāṃ jagrāha raukmai rathaśatairvṛtaḥ|| 30

अर्थ

उग्रसेनका लड़का था कंस। उसने अपनी चचेरी बहिन देवकीको प्रसन्‍न करनेके लिये उसके रथके घोड़ोंकी रास पकड़ ली। वह स्वयं ही रथ हाँकने लगा, यद्यपि उसके साथ सैकड़ों सोनेके बने हुए रथ चल रहे थे॥ ३०॥✎ 882 1651

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #882 शब्दोंके बीचका स्थान: ३५॥वह → ३५॥ वह
  • #1651 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: वस्त्रा-भूषणोंसे → वस्त्राभूषणोंसे

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