श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.39

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

देहे पंचत्वमापन्‍ने देही कर्मानुगोऽवशः।

देहान्तरमनुप्राप्य प्राक्तनं त्यजते वपुः॥ ३९

dehe paṃcatvamāpanne dehī karmānugo'vaśaḥ|

dehāntaramanuprāpya prāktanaṃ tyajate vapuḥ|| 39

अर्थ

जब शरीरका अन्त हो जाता है, तब जीव अपने कर्मके अनुसार दूसरे शरीरको ग्रहण करके अपने पहले शरीरको छोड़ देता है। उसे विवश होकर ऐसा करना पड़ता है॥ ३९॥

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