श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

स्वप्ने यथा पश्यति देहमीदृशं

मनोरथेनाभिनिविष्टचेतनः ।

दृष्टश्रुताभ्यां मनसानुचिन्तयन्

प्रपद्यते तत् किमपि ह्यपस्मृतिः॥ ४१

svapne yathā paśyati dehamīdṛśaṃ

manorathenābhiniviṣṭacetanaḥ |

dṛṣṭaśrutābhyāṃ manasānucintayan

prapadyate tat kimapi hyapasmṛtiḥ|| 41

अर्थ

जैसे कोई पुरुष जाग्रत्-अवस्थामें राजाके ऐश्‍वर्यको देखकर और इन्द्रादिके ऐश्‍वर्यको सुनकर उसकी अभिलाषा करने लगता है और उसका चिन्तन करते-करते उन्हीं बातोंमें घुल-मिलकर एक हो जाता है तथा स्वप्नमें अपनेको राजा या इन्द्रके रूपमें अनुभव करने लगता है, साथ ही अपने दरिद्रावस्थाके शरीरको भूल जाता है। कभी-कभी तो जाग्रत् अवस्थामें ही मन-ही-मन उन बातोंका चिन्तन करते-करते तन्मय हो जाता है और उसे स्थूल शरीरकी सुधि नहीं रहती। वैसे ही जीव कर्मकृत कामना और कामनाकृत कर्मके वश होकर दूसरे शरीरको प्राप्त हो जाता है और अपने पहले शरीरको भूल जाता है॥ ४१॥

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