॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.1.44
तस्मान्न कस्यचिद् द्रोहमाचरेत् स तथाविधः।
आत्मनः क्षेममन्विच्छन् द्रोग्धुर्वै परतो भयम्॥ ४४
tasmānna kasyacid drohamācaret sa tathāvidhaḥ|
ātmanaḥ kṣemamanvicchan drogdhurvai parato bhayam|| 44
अर्थ
इसलिये जो अपना कल्याण चाहता है, उसे किसीसे द्रोह नहीं करना चाहिये; क्योंकि जीव कर्मके अधीन हो गया है और जो किसीसे भी द्रोह करेगा, उसको इस जीवनमें शत्रुसे और जीवनके बाद परलोकसे भयभीत होना ही पड़ेगा॥ ४४॥