श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

स्वसुर्वधान्‍निववृते कंसस्तद्वाक्यसारवित्।

वसुदेवोऽपि तं प्रीतः प्रशस्य प्राविशद् गृहम्॥ ५५

svasurvadhānnivavṛte kaṃsastadvākyasāravit|

vasudevo'pi taṃ prītaḥ praśasya prāviśad gṛham|| 55

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कंस जानता था कि वसुदेवजीके वचन झूठे नहीं होते और इन्होंने जो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है। इसलिये उसने अपनी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया। इससे वसुदेवजी बहुत प्रसन्‍न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर चले आये॥ ५५॥

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