श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कंस जानता था कि वसुदेवजीके वचन झूठे नहीं होते और इन्होंने जो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है। इसलिये उसने अपनी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया। इससे वसुदेवजी बहुत प्रसन्न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर चले आये॥ ५५॥
स्वसुर्वधान्निववृते कंसस्तद्वाक्यसारवित्।
वसुदेवोऽपि तं प्रीतः प्रशस्य प्राविशद् गृहम्॥ ५५
श्रीशुकदेवजी कहते हैं—परीक्षित्! कंस जानता था कि वसुदेवजीके वचन झूठे नहीं होते और इन्होंने जो कुछ कहा है, वह युक्तिसंगत भी है। इसलिये उसने अपनी बहिन देवकीको मारनेका विचार छोड़ दिया। इससे वसुदेवजी बहुत प्रसन्न हुए और उसकी प्रशंसा करके अपने घर चले आये॥ ५५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.55 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 126) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/55/