jugopa kukṣiṃgata āttacakro mātuśca me yaḥ śaraṇaṃ gatāyāḥ|| 6
अर्थ
महाराज! मेरा यह शरीर—जो आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशोंका एकमात्र सहारा था—अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था। उस समय मेरी माता जब भगवान्की शरणमें गयीं, तब उन्होंने हाथमें चक्र लेकर मेरी माताके गर्भमें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की॥ ६॥
द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदंगं सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम्।
जुगोप कुक्षिंगत आत्तचक्रो मातुश्च मे यः शरणं गतायाः॥ ६
महाराज! मेरा यह शरीर—जो आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशोंका एकमात्र सहारा था—अश्वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था। उस समय मेरी माता जब भगवान्की शरणमें गयीं, तब उन्होंने हाथमें चक्र लेकर मेरी माताके गर्भमें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.1.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 120) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/1/6/