श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.6

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

द्रौण्यस्त्रविप्लुष्टमिदं मदंगं सन्तानबीजं कुरुपाण्डवानाम्।

जुगोप कुक्षिंगत आत्तचक्रो मातुश्‍च मे यः शरणं गतायाः॥ ६

drauṇyastravipluṣṭamidaṃ madaṃgaṃ santānabījaṃ kurupāṇḍavānām|

jugopa kukṣiṃgata āttacakro mātuśca me yaḥ śaraṇaṃ gatāyāḥ|| 6

अर्थ

महाराज! मेरा यह शरीर—जो आपके सामने है तथा जो कौरव और पाण्डव दोनों ही वंशोंका एकमात्र सहारा था—अश्‍वत्थामाके ब्रह्मास्त्रसे जल चुका था। उस समय मेरी माता जब भगवान्‌की शरणमें गयीं, तब उन्होंने हाथमें चक्र लेकर मेरी माताके गर्भमें प्रवेश किया और मेरी रक्षा की॥ ६॥

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