श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.1.66

दशम स्कन्ध · अध्याय 1 · अथ प्रथमोऽध्यायः

देवकीं वसुदेवं च निगृह्य निगडैर्गृहे।

जातं जातमहन् पुत्रं तयोरजनशंकया॥ ६६

devakīṃ vasudevaṃ ca nigṛhya nigaḍairgṛhe|

jātaṃ jātamahan putraṃ tayorajanaśaṃkayā|| 66

अर्थ

जब देवर्षि नारद इतना कहकर चले गये, तब कंसको यह निश्‍चय हो गया कि यदुवंशी देवता हैं और देवकीके गर्भसे विष्णुभगवान् ही मुझे मारनेके लिये पैदा होनेवाले हैं। इसलिये उसने देवकी और वसुदेवको हथकड़ी-बेड़ीसे जकड़कर कैदमें डाल दिया और उन दोनोंसे जो-जो पुत्र होते गये, उन्हें वह मारता गया। उसे हर बार यह शंका बनी रहती कि कहीं विष्णु ही उस बालकके रूपमें न आ गया हो॥ ६५-६६॥

यह अर्थ श्लोक 65–66 का एक साथ है, जैसा मुद्रित ग्रन्थमें।

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