॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.10.16
नित्यं क्षुत्क्षामदेहस्य दरिद्रस्यान्नकांक्षिणः।
इन्द्रियाण्यनुशुष्यन्ति हिंसापि विनिवर्तते॥ १६
nityaṃ kṣutkṣāmadehasya daridrasyānnakāṃkṣiṇaḥ|
indriyāṇyanuśuṣyanti hiṃsāpi vinivartate|| 16
अर्थ
जिसे प्रतिदिन भोजनके लिये अन्न जुटाना पड़ता है, भूखसे जिसका शरीर दुबला-पतला हो गया है, उस दरिद्रकी इन्द्रियाँ भी अधिक विषय नहीं भोगना चाहतीं, सूख जाती हैं और फिर वह अपने भोगोंके लिये दूसरे प्राणियोंको सताता नहीं—उनकी हिंसा नहीं करता॥ १६॥