परन्तु गोपोंने बालकोंकी बात नहीं मानी। वे कहने लगे—‘एक नन्हा-सा बच्चा इतने बड़े वृक्षोंको उखाड़ डाले, यह कभी सम्भव नहीं है।’ किसी-किसीके चित्तमें श्रीकृष्णकी पहलेकी लीलाओंका स्मरण करके सन्देह भी हो आया॥ ५॥
न ते तदुक्तं जगृहुर्न घटेतेति तस्य तत्।
बालस्योत्पाटनं तर्वोः केचित् सन्दिग्धचेतसः॥ ५
परन्तु गोपोंने बालकोंकी बात नहीं मानी। वे कहने लगे—‘एक नन्हा-सा बच्चा इतने बड़े वृक्षोंको उखाड़ डाले, यह कभी सम्भव नहीं है।’ किसी-किसीके चित्तमें श्रीकृष्णकी पहलेकी लीलाओंका स्मरण करके सन्देह भी हो आया॥ ५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.11.5 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 196) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/11/5/