श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

तं तालुमूलं प्रदहन्तमग्‍निवद्

गोपालसूनुं पितरं जगद्गुरोः।

चच्छर्द सद्योऽतिरुषाक्षतं बक-

स्तुण्डेन हन्तुं पुनरभ्यपद्यत॥ ५०

taṃ tālumūlaṃ pradahantamagnivad

gopālasūnuṃ pitaraṃ jagadguroḥ|

caccharda sadyo'tiruṣākṣataṃ baka-

stuṇḍena hantuṃ punarabhyapadyata|| 50

अर्थ

परीक्षित्! श्रीकृष्ण लोकपितामह ब्रह्माके भी पिता हैं। वे लीलासे ही गोपाल-बालक बने हुए हैं। जब वे बगुलेके तालुके नीचे पहुँचे, तब वे आगके समान उसका तालु जलाने लगे। अतः उस दैत्यने श्रीकृष्णके शरीरपर बिना किसी प्रकारका घाव किये ही झटपट उन्हें उगल दिया और फिर बड़े क्रोधसे अपनी कठोर चोंचसे उनपर चोट करनेके लिये टूट पड़ा॥ ५०॥

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