यह सब होनेपर भी वे भयंकर असुर इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते। आते हैं इसे मार डालनेकी नीयतसे, किन्तु आगपर गिरकर पतिंगोंकी तरह उलटे स्वयं स्वाहा हो जाते हैं॥ ५६॥
अथाप्यभिभवन्त्येनं नैव ते घोरदर्शनाः।
जिघांसयैनमासाद्य नश्यन्त्यग्नौ पतंगवत्॥ ५६
यह सब होनेपर भी वे भयंकर असुर इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते। आते हैं इसे मार डालनेकी नीयतसे, किन्तु आगपर गिरकर पतिंगोंकी तरह उलटे स्वयं स्वाहा हो जाते हैं॥ ५६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.11.56 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 202) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/11/56/