श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.56

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

अथाप्यभिभवन्त्येनं नैव ते घोरदर्शनाः।

जिघांसयैनमासाद्य नश्यन्त्य‌ग्‍नौ पतंगवत्॥ ५६

athāpyabhibhavantyenaṃ naiva te ghoradarśanāḥ|

jighāṃsayainamāsādya naśyantyagnau pataṃgavat|| 56

अर्थ

यह सब होनेपर भी वे भयंकर असुर इसका कुछ भी नहीं बिगाड़ पाते। आते हैं इसे मार डालनेकी नीयतसे, किन्तु आगपर गिरकर पतिंगोंकी तरह उलटे स्वयं स्वाहा हो जाते हैं॥ ५६॥

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