श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.11.8

दशम स्कन्ध · अध्याय 11 · अथैकादशोऽध्यायः

बिभर्ति क्वचिदाज्ञप्तः पीठकोन्मानपादुकम्।

बाहुक्षेपं च कुरुते स्वानां च प्रीतिमावहन्॥ ८

bibharti kvacidājñaptaḥ pīṭhakonmānapādukam|

bāhukṣepaṃ ca kurute svānāṃ ca prītimāvahan|| 8

अर्थ

वे कभी उनकी आज्ञासे पीढ़ा ले आते, तो कभी दुसेरी आदि तौलनेके बटखरे उठा लाते। कभी खड़ाऊँ ले आते, तो कभी अपने प्रेमी भक्तोंको आनन्दित करनेके लिये पहलवानोंकी भाँति ताल ठोंकने लगते॥ ८॥✎ 1658

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1658 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: जानने-वाले → जाननेवाले

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