॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.12.15
एते यदा मत्सुहृदोस्तिलापः
कृतास्तदा नष्टसमा व्रजौकसः।
प्राणे गते वर्ष्मसु का नु चिन्ता
प्रजासवः प्राणभृतो हि ये ते॥ १५
ete yadā matsuhṛdostilāpaḥ
kṛtāstadā naṣṭasamā vrajaukasaḥ|
prāṇe gate varṣmasu kā nu cintā
prajāsavaḥ prāṇabhṛto hi ye te|| 15
अर्थ
जब ये सब मरकर मेरे उन दोनों भाई-बहिनोंके मृततर्पणकी तिलांजलि बन जायँगे, तब व्रजवासी अपने-आप मरे-जैसे हो जायँगे। सन्तान ही प्राणियोंके प्राण हैं। जब प्राण ही न रहेंगे, तब शरीर कैसे रहेगा? इसकी मृत्युसे व्रजवासी अपने-आप मर जायँगे’॥ १५॥