श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.17

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

धराधरोष्ठो जलदोत्तरोष्ठो

दर्याननान्तो गिरिशृंगदंष्ट्रः।

ध्वान्तान्तरास्यो वितताध्वजिह्वः

परुषानिलश्‍वासदवेक्षणोष्णः ॥ १७

dharādharoṣṭho jaladottaroṣṭho

daryānanānto giriśṛṃgadaṃṣṭraḥ|

dhvāntāntarāsyo vitatādhvajihvaḥ

paruṣānilaśvāsadavekṣaṇoṣṇaḥ || 17

अर्थ

उसका नीचेका होठ पृथ्वीसे और ऊपरका होठ बादलोंसे लग रहा था। उसके जबड़े कन्दराओंके समान थे और दाढ़ें पर्वतके शिखर-सी जान पड़ती थीं। मुँहके भीतर घोर अन्धकार था। जीभ एक चौड़ी लाल सड़क-सी दीखती थी। साँस आँधीके समान थी और आँखें दावानलके समान दहक रही थीं॥ १७॥

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