श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.12.42

दशम स्कन्ध · अध्याय 12 · अथ द्वादशोऽध्यायः

तद् ब्रूहि मे महायोगिन् परं कौतूहलं गुरो।

नूनमेतद्धरेरेव माया भवति नान्यथा॥ ४२

tad brūhi me mahāyogin paraṃ kautūhalaṃ guro|

nūnametaddharereva māyā bhavati nānyathā|| 42

अर्थ

महायोगी गुरुदेव! मुझे इस आश्‍चर्यपूर्ण रहस्यको जाननेके लिये बड़ा कौतूहल हो रहा है। आप कृपा करके बतलाइये। अवश्य ही इसमें भगवान् श्रीकृष्णकी विचित्र घटनाओंको घटित करनेवाली मायाका कुछ-न-कुछ काम होगा। क्योंकि और किसी प्रकार ऐसा नहीं हो सकता॥ ४२॥

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