श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.41

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

यावन्तो गोकुले बालाः सवत्साः सर्व एव हि।

मायाशये शयाना मे नाद्यापि पुनरुत्थिताः॥ ४१

yāvanto gokule bālāḥ savatsāḥ sarva eva hi|

māyāśaye śayānā me nādyāpi punarutthitāḥ|| 41

अर्थ

वे सोचने लगे—‘गोकुलमें जितने भी ग्वालबाल और बछड़े थे, वे तो मेरी मायामयी शय्यापर सो रहे हैं—उनको तो मैंने अपनी मायासे अचेत कर दिया था; वे तबसे अबतक सचेत नहीं हुए॥ ४१॥

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