श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.43

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

एवमेतेषु भेदेषु चिरं ध्यात्वा स आत्मभूः।

सत्याः के कतरे नेति ज्ञातुं नेष्टे कथंचन॥ ४३

evameteṣu bhedeṣu ciraṃ dhyātvā sa ātmabhūḥ|

satyāḥ ke katare neti jñātuṃ neṣṭe kathaṃcana|| 43

अर्थ

ब्रह्माजीने दोनों स्थानोंपर दोनोंको देखा और बहुत देरतक ध्यान करके अपनी ज्ञानदृष्टिसे उनका रहस्य खोलना चाहा; परन्तु इन दोनोंमें कौन-से पहलेके ग्वालबाल हैं और कौन-से पीछे बना लिये गये हैं, इनमेंसे कौन सच्चे हैं और कौन बनावटी—यह बात वे किसी प्रकार न समझ सके॥ ४३॥

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