श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.45

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

तम्यां तमोवन्‍नैहारं खद्योतार्चिरिवाहनि।

महतीतरमायैश्यं निहन्त्यात्मनि युंजतः॥ ४५

tamyāṃ tamovannaihāraṃ khadyotārcirivāhani|

mahatītaramāyaiśyaṃ nihantyātmani yuṃjataḥ|| 45

अर्थ

जिस प्रकार रातके घोर अन्धकारमें कुहरेके अन्धकारका और दिनके प्रकाशमें जुगनूके प्रकाशका पता नहीं चलता, वैसे ही जब क्षुद्र पुरुष महापुरुषोंपर अपनी मायाका प्रयोग करते हैं, तब वह उनका तो कुछ बिगाड़ नहीं सकती, अपना ही प्रभाव खो बैठती है॥ ४५॥

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