श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.13.57

दशम स्कन्ध · अध्याय 13 · अथ त्रयोदशोऽध्यायः

इतीरेशेऽतर्क्ये निजमहिमनि स्वप्रमितिके

परत्राजातोऽतन्‍निरसनमुखब्रह्मकमितौ ।

अनीशेऽपि द्रष्टुं किमिदमिति वा मुह्यति सति

चछादाजो ज्ञात्वा सपदि परमोऽजाजवनिकाम्॥ ५७

itīreśe'tarkye nijamahimani svapramitike

paratrājāto'tannirasanamukhabrahmakamitau |

anīśe'pi draṣṭuṃ kimidamiti vā muhyati sati

cachādājo jñātvā sapadi paramo'jājavanikām|| 57

अर्थ

परीक्षित्! भगवान्‌का स्वरूप तर्कसे परे है। उसकी महिमा असाधारण है। वह स्वयंप्रकाश, आनन्दस्वरूप और मायासे अतीत है। वेदान्त भी साक्षात्रूपसे उसका वर्णन करनेमें असमर्थ है, इसलिये उससे भिन्‍नका निषेध करके आनन्दस्वरूप ब्रह्मका किसी प्रकार कुछ संकेत करता है। यद्यपि ब्रह्माजी समस्त विद्याओंके अधिपति हैं, तथापि भगवान्‌के दिव्यस्वरूपको वे तनिक भी न समझ सके कि यह क्या है। यहाँतक कि वे भगवान्‌के उन महिमामय रूपोंको देखनेमें भी असमर्थ हो गये। उनकी आँखें मुँद गयीं। भगवान् श्रीकृष्णने ब्रह्माके इस मोह और असमर्थताको जानकर बिना किसी प्रयासके तुरंत अपनी मायाका परदा हटा दिया॥ ५७॥✎ 1662

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1662 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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