॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.12
उत्क्षेपणं गर्भगतस्य पादयोः
किं कल्पते मातुरधोक्षजागसे।
किमस्तिनास्तिव्यपदेशभूषितं
तवास्ति कुक्षेः कियदप्यनन्तः॥ १२
utkṣepaṇaṃ garbhagatasya pādayoḥ
kiṃ kalpate māturadhokṣajāgase|
kimastināstivyapadeśabhūṣitaṃ
tavāsti kukṣeḥ kiyadapyanantaḥ|| 12
अर्थ
वृत्तियोंकी पकड़में न आनेवाले परमात्मन्! जब बच्चा माताके पेटमें रहता है, तब अज्ञानवश अपने हाथ-पैर पीटता है; परन्तु क्या माता उसे अपराध समझती है या उसके लिये वह कोई अपराध होता है? ‘है’ और ‘नहीं है’—इन शब्दोंसे कही जानेवाली कोई भी वस्तु ऐसी है क्या, जो आपकी कोखके भीतर न हो?॥ १२॥