॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.14.15
तच्चेज्जलस्थं तव सज्जगद्वपुः
किं मे न दृष्टं भगवंस्तदैव।
किं वा सुदृष्टं हृदि मे तदैव
किं नो सपद्येव पुनर्व्यदर्शि॥ १५
taccejjalasthaṃ tava sajjagadvapuḥ
kiṃ me na dṛṣṭaṃ bhagavaṃstadaiva|
kiṃ vā sudṛṣṭaṃ hṛdi me tadaiva
kiṃ no sapadyeva punarvyadarśi|| 15
अर्थ
भगवन्! यदि आपका वह विराट् स्वरूप सचमुच उस समय जलमें ही था तो मैंने उसी समय उसे क्यों नहीं देखा, जब कि मैं कमलनालके मार्गसे उसे सौ वर्षतक जलमें ढूँढ़ता रहा? फिर मैंने जब तपस्या की, तब उसी समय मेरे हृदयमें उसका दर्शन कैसे हो गया? और फिर कुछ ही क्षणोंमें वह पुनः क्यों नहीं दीखा, अन्तर्धान क्यों हो गया?॥ १५॥✎ 1421