श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.25

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

आत्मानमेवात्मतयाविजानतां

तेनैव जातं निखिलं प्रपंचितम्।

ज्ञानेन भूयोऽपि च तत् प्रलीयते

रज्ज्वामहेर्भोगभवाभवौ यथा॥ २५

ātmānamevātmatayāvijānatāṃ

tenaiva jātaṃ nikhilaṃ prapaṃcitam|

jñānena bhūyo'pi ca tat pralīyate

rajjvāmaherbhogabhavābhavau yathā|| 25

अर्थ

जो पुरुष परमात्माको आत्माके रूपमें नहीं जानते, उन्हें उस अज्ञानके कारण ही इस नामरूपात्मक निखिल प्रपंचकी उत्पत्तिका भ्रम हो जाता है। किन्तु ज्ञान होते ही इसका आत्यन्तिक प्रलय हो जाता है। जैसे रस्सीमें भ्रमके कारण ही साँपकी प्रतीति होती है और भ्रमके निवृत्त होते ही उसकी निवृत्ति हो जाती है॥ २५॥

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