श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.28

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

अन्तर्भवेऽनन्त भवन्तमेव

ह्यतत्त्यजन्तो मृगयन्ति सन्तः।

असन्तमप्यन्त्यहिमन्तरेण

सन्तं गुणं तं किमु यन्ति सन्तः॥ २८

antarbhave'nanta bhavantameva

hyatattyajanto mṛgayanti santaḥ|

asantamapyantyahimantareṇa

santaṃ guṇaṃ taṃ kimu yanti santaḥ|| 28

अर्थ

हे अनन्त! आप तो सबके अन्तःकरणमें ही विराजमान हैं। इसलिये सन्तलोग आपके अतिरिक्त जो कुछ प्रतीत हो रहा है, उसका परित्याग करते हुए अपने भीतर ही आपको ढूँढ़ते हैं। क्योंकि यद्यपि रस्सीमें साँप नहीं है, फिर भी उस प्रतीयमान साँपको मिथ्या निश्‍चय किये बिना भला, कोई सत्पुरुष सच्ची रस्सीको कैसे जान सकता है?॥ २८॥

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