परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णको देखते ही ग्वाल-बालोंने बड़ी उतावलीसे कहा—‘भाई! तुम भले आये। स्वागत है, स्वागत! अभी तो हमने तुम्हारे बिना एक कौर भी नहीं खाया है। आओ, इधर आओ; आनन्दसे भोजन करो॥ ४५॥✎ 1423
ऊचुश्च सुहृदः कृष्णं स्वागतं तेऽतिरंहसा।
नैकोऽप्यभोजि कवल एहीतः साधु भुज्यताम्॥ ४५
परीक्षित्! भगवान् श्रीकृष्णको देखते ही ग्वाल-बालोंने बड़ी उतावलीसे कहा—‘भाई! तुम भले आये। स्वागत है, स्वागत! अभी तो हमने तुम्हारे बिना एक कौर भी नहीं खाया है। आओ, इधर आओ; आनन्दसे भोजन करो॥ ४५॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.14.45 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 229) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/14/45/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1423 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): महकते → महँकते