श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.50

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

श्रीशुक उवाच

सर्वेषामपि भूतानां नृप स्वात्मैव वल्लभः।

इतरेऽपत्यवित्ताद्यास्तद्वल्लभतयैव हि॥ ५०

sarveṣāmapi bhūtānāṃ nṛpa svātmaiva vallabhaḥ|

itare'patyavittādyāstadvallabhatayaiva hi|| 50

अर्थ

श्रीशुकदेवजी कहते हैं—राजन्! संसारके सभी प्राणी अपने आत्मासे ही सबसे बढ़कर प्रेम करते हैं। पुत्रसे, धनसे या और किसीसे जो प्रेम होता है—वह तो इसलिये कि वे वस्तुएँ अपने आत्माको प्रिय लगती हैं॥ ५०॥

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