श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.55

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

कृष्णमेनमवेहि त्वमात्मानमखिलात्मनाम्।

जगद्धिताय सोऽप्यत्र देहीवाभाति मायया॥ ५५

kṛṣṇamenamavehi tvamātmānamakhilātmanām|

jagaddhitāya so'pyatra dehīvābhāti māyayā|| 55

अर्थ

इन श्रीकृष्णको ही तुम सब आत्माओंका आत्मा समझो। संसारके कल्याणके लिये ही योगमायाका आश्रय लेकर वे यहाँ देहधारीके समान जान पड़ते हैं॥ ५५॥

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