श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.14.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 14 · अथ चतुर्दशोऽध्यायः

गुणात्मनस्तेऽपि गुणान् विमातुं

हितावतीर्णस्य क ईशिरेऽस्य।

कालेन यैर्वा विमिताः सुकल्पै-

र्भूपांसवः खे मिहिका द्युभासः॥ ७

guṇātmanaste'pi guṇān vimātuṃ

hitāvatīrṇasya ka īśire'sya|

kālena yairvā vimitāḥ sukalpai-

rbhūpāṃsavaḥ khe mihikā dyubhāsaḥ|| 7

अर्थ

परन्तु भगवन्! जिन समर्थ पुरुषोंने अनेक जन्मोंतक परिश्रम करके पृथ्वीका एक-एक परमाणु, आकाशके हिमकण (ओसकी बूँदें) तथा उसमें चमकनेवाले नक्षत्र एवं तारोंतकको गिन डाला है—उनमें भी भला, ऐसा कौन हो सकता है जो आपके सगुण स्वरूपके अनन्त गुणोंको गिन सके? प्रभो! आप केवल संसारके कल्याणके लिये ही अवतीर्ण हुए हैं। सो भगवन्! आपकी महिमाका ज्ञान तो बड़ा ही कठिन है॥ ७॥

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