श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.15.46

दशम स्कन्ध · अध्याय 15 · अथ पञ्चदशोऽध्यायः

जनन्युपहृतं प्राश्य स्वाद्वन्‍नमुपलालितौ।

संविश्य वरशय्यायां सुखं सुषुपतुर्व्रजे॥ ४६

jananyupahṛtaṃ prāśya svādvannamupalālitau|

saṃviśya varaśayyāyāṃ sukhaṃ suṣupaturvraje|| 46

अर्थ

तत्पश्‍चात् दोनों भाइयोंने माताओंका परोसा हुआ स्वादिष्ट अन्‍न भोजन किया। इसके बाद बड़े लाड़-प्यारसे दुलार-दुलार कर यशोदा और रोहिणीने उन्हें सुन्दर शय्यापर सुलाया। श्याम और राम बड़े आरामसे सो गये॥ ४६॥

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