राजन्! अन्तमें उन्होंने यही निश्चय किया कि हमलोग विषैला जल पी लेनेके कारण मर चुके थे, परन्तु हमारे श्रीकृष्णने अपनी अनुग्रहभरी दृष्टिसे देखकर हमें फिरसे जिला दिया है॥ ५२॥
अन्वमंसत तद् राजन् गोविन्दानुग्रहेक्षितम्।
पीत्वा विषं परेतस्य पुनरुत्थानमात्मनः॥ ५२
राजन्! अन्तमें उन्होंने यही निश्चय किया कि हमलोग विषैला जल पी लेनेके कारण मर चुके थे, परन्तु हमारे श्रीकृष्णने अपनी अनुग्रहभरी दृष्टिसे देखकर हमें फिरसे जिला दिया है॥ ५२॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.15.52 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 238) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/15/52/