श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यमुनाजीमें कालिय नागका एक कुण्ड था। उसका जल विषकी गर्मीसे खौलता रहता था। यहाँतक कि उसके ऊपर उड़नेवाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे॥ ४॥✎ 2075
कालिन्द्यां कालियस्यासीद्ध्रदः कश्चिद् विषाग्निना।
श्रप्यमाणपया यस्मिन् पतन्त्युपरिगाः खगाः॥ ४
श्रीशुकदेवजीने कहा—परीक्षित्! यमुनाजीमें कालिय नागका एक कुण्ड था। उसका जल विषकी गर्मीसे खौलता रहता था। यहाँतक कि उसके ऊपर उड़नेवाले पक्षी भी झुलसकर उसमें गिर जाया करते थे॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 238) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/16/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)