श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.48

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः।

अविश्‍वाय च विश्‍वाय तद‍्द्रष्ट्रेऽस्य च हेतवे॥ ४८

parāvaragatijñāya sarvādhyakṣāya te namaḥ|

aviśvāya ca viśvāya taddraṣṭre'sya ca hetave|| 48

अर्थ

आप स्थूल, सूक्ष्म समस्त गतियोंके जाननेवाले तथा सबके साक्षी हैं। आप नामरूपात्मक विश्‍वप्रपंचके निषेधकी अवधि तथा उसके अधिष्ठान होनेके कारण विश्‍वरूप भी हैं। आप विश्‍वके अध्यास तथा अपवादके साक्षी हैं एवं अज्ञानके द्वारा उसकी सत्यत्वभ्रान्ति एवं स्वरूपज्ञानके द्वारा उसकी आत्यन्तिक निवृत्तिके भी कारण हैं। आपको हमारा नमस्कार है॥ ४८॥

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