anugrahaṃ nigrahaṃ vā manyase tad vidhehi naḥ|| 59
अर्थ
आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। आप ही हमारे स्वभाव और इस मायाके कारण हैं। अब आप अपनी इच्छासे—जैसा ठीक समझें—कृपा कीजिये या दण्ड दीजिये॥ ५९॥
भवान् हि कारणं तत्र सर्वज्ञो जगदीश्वरः।
अनुग्रहं निग्रहं वा मन्यसे तद् विधेहि नः॥ ५९
आप सर्वज्ञ और सम्पूर्ण जगत्के स्वामी हैं। आप ही हमारे स्वभाव और इस मायाके कारण हैं। अब आप अपनी इच्छासे—जैसा ठीक समझें—कृपा कीजिये या दण्ड दीजिये॥ ५९॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.16.59 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 247) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/16/59/