श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.16.7

दशम स्कन्ध · अध्याय 16 · अथ षोडशोऽध्यायः

सर्पह्रदः पुरुषसारनिपातवेग- ✎ 1144

संक्षोभितोरगविषोच्छ्वसिताम्बुराशिः।

पर्यक् प्लुतो विषकषायविभीषणोर्मि-

र्धावन् धनुःशतमनन्तबलस्य किं तत्॥ ७

sarpahradaḥ puruṣasāranipātavega-

saṃkṣobhitoragaviṣocchvasitāmburāśiḥ|

paryak pluto viṣakaṣāyavibhīṣaṇormi-

rdhāvan dhanuḥśatamanantabalasya kiṃ tat|| 7

अर्थ

यमुनाजीका जल साँपके विषके कारण पहलेसे ही खौल रहा था। उसकी तरंगें लाल-पीली और अत्यन्त भयंकर उठ रही थीं। पुरुषोत्तम भगवान् श्रीकृष्णके कूद पड़नेसे उसका जल और भी उछलने लगा। उस समय तो कालियदहका जल इधर-उधर उछलकर चार सौ हाथतक फैल गया। अचिन्त्य अनन्त बलशाली भगवान् श्रीकृष्णके लिये इसमें कोई आश्‍चर्यकी बात नहीं है॥ ७॥✎ 2075

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (2)
  • #1144 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): सर्पहृद: → सर्पह्रदः
  • #2075 यूनिकोड-रूप (अक्षर वही): डि़ → ड़ि

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