॥ श्रीहरिः ॥
देहि दानं द्विजातीनां कृष्णनिर्मुक्तिहेतवे।
नन्दः प्रीतमना राजन् गाः सुवर्णं तदादिशत्॥ १८
dehi dānaṃ dvijātīnāṃ kṛṣṇanirmuktihetave|
nandaḥ prītamanā rājan gāḥ suvarṇaṃ tadādiśat|| 18
अर्थ
श्रीकृष्णके मृत्युके मुखसे लौट आनेके उपलक्ष्यमें तुम ब्राह्मणोंको दान करो।’ परीक्षित्! ब्राह्मणोंकी बात सुनकर नन्दबाबाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बहुत-सा सोना और गौएँ ब्राह्मणोंको दान दीं॥ १८॥
देहि दानं द्विजातीनां कृष्णनिर्मुक्तिहेतवे।
नन्दः प्रीतमना राजन् गाः सुवर्णं तदादिशत्॥ १८
श्रीकृष्णके मृत्युके मुखसे लौट आनेके उपलक्ष्यमें तुम ब्राह्मणोंको दान करो।’ परीक्षित्! ब्राह्मणोंकी बात सुनकर नन्दबाबाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उन्होंने बहुत-सा सोना और गौएँ ब्राह्मणोंको दान दीं॥ १८॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.17.18 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 251) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/17/18/