॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.18.26
तमुद्वहन् धरणिधरेन्द्रगौरवं
महासुरो विगतरयो निजं वपुः।
स आस्थितः पुरटपरिच्छदो बभौ
तडिद् द्युमानुडुपतिवाडिवाम्बुदः॥ २६
tamudvahan dharaṇidharendragauravaṃ
mahāsuro vigatarayo nijaṃ vapuḥ|
sa āsthitaḥ puraṭaparicchado babhau
taḍid dyumānuḍupativāḍivāmbudaḥ|| 26
अर्थ
बलरामजी बड़े भारी पर्वतके समान बोझवाले थे। उनको लेकर प्रलम्बासुर दूरतक न जा सका, उसकी चाल रुक गयी। तब उसने अपना स्वाभाविक दैत्यरूप धारण कर लिया। उसके काले शरीरपर सोनेके गहने चमक रहे थे और गौरसुन्दर बलरामजीको धारण करनेके कारण उसकी ऐसी शोभा हो रही थी, मानो बिजलीसे युक्त काला बादल चन्द्रमाको धारण किये हुए हो॥ २६॥