झींगुरोंकी तीखी झंकार झरनोंके मधुर झर-झरमें छिप गयी थी। उन झरनोंसे सदा-सर्वदा बहुत ठंडी जलकी फुहियाँ उड़ा करती थीं, जिनसे वहाँके वृक्षोंकी हरियाली देखते ही बनती थी॥ ४॥
यत्र निर्झरनिर्ह्रादनिवृत्तस्वनझिल्लिकम्।
शश्वत्तच्छीकरर्जीषद्रुममण्डलमण्डितम्॥ ४
झींगुरोंकी तीखी झंकार झरनोंके मधुर झर-झरमें छिप गयी थी। उन झरनोंसे सदा-सर्वदा बहुत ठंडी जलकी फुहियाँ उड़ा करती थीं, जिनसे वहाँके वृक्षोंकी हरियाली देखते ही बनती थी॥ ४॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.18.4 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 252) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/18/4/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1149 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): निर्झरनिर्हृदनिवृत्तस्वनझिल्लिकम्। → निर्झरनिर्ह्रादनिवृत्तस्वनझिल्लिकम्।