नदियोंमें अगाध जल भरा हुआ था। बड़ी-बड़ी लहरें उनके तटोंको चूम जाया करती थीं। वे उनके पुलिनोंसे टकरातीं और उन्हें स्वच्छ बना जातीं। उनके कारण आस-पासकी भूमि गीली बनी रहती और सूर्यकी अत्यन्त उग्र तथा तीखी किरणें भी वहाँकी पृथ्वी और हरी-भरी घासको नहीं सुखा सकती थीं; चारों ओर हरियाली छा रही थी॥ ६॥
अगाधतोयह्रदिनीतटोर्मिभि-
र्द्रवत्पुरीष्याः पुलिनैः समन्ततः।
न यत्र चण्डांशुकरा विषोल्बणा
भुवो रसं शाद्वलितं च गृह्णते॥ ६
नदियोंमें अगाध जल भरा हुआ था। बड़ी-बड़ी लहरें उनके तटोंको चूम जाया करती थीं। वे उनके पुलिनोंसे टकरातीं और उन्हें स्वच्छ बना जातीं। उनके कारण आस-पासकी भूमि गीली बनी रहती और सूर्यकी अत्यन्त उग्र तथा तीखी किरणें भी वहाँकी पृथ्वी और हरी-भरी घासको नहीं सुखा सकती थीं; चारों ओर हरियाली छा रही थी॥ ६॥
श्रीमद्भागवत महापुराण 10.18.6 · गीताप्रेस, गोरखपुर (द्वितीय खण्ड, पृष्ठ 252) · https://371ace2f.srimad-bhagavatam.pages.dev/10/18/6/इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
#1150 अक्षर (मुद्रित पृष्ठके पाठसे): अगाधतोयहृदिनीतटोर्मिभि- → अगाधतोयह्रदिनीतटोर्मिभि-