श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.15

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

गर्भे प्रणीते देवक्या रोहिणीं योगनिद्रया।

अहो विस्रंसितो गर्भ इति पौरा विचुक्रुशुः॥ १५

garbhe praṇīte devakyā rohiṇīṃ yoganidrayā|

aho visraṃsito garbha iti paurā vicukruśuḥ|| 15

अर्थ

जब योगमायाने देवकीका गर्भ ले जाकर रोहिणीके उदरमें रख दिया, तब पुरवासी बड़े दुःखके साथ आपसमें कहने लगे—‘हाय! बेचारी देवकीका यह गर्भ तो नष्ट ही हो गया’॥ १५॥

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