श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.26

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सत्यव्रतं सत्यपरं त्रिसत्यं

सत्यस्य योनिं निहितं च सत्ये।

सत्यस्य सत्यमृतसत्यनेत्रं

सत्यात्मकं त्वां शरणं प्रपन्‍नाः॥ २६

satyavrataṃ satyaparaṃ trisatyaṃ

satyasya yoniṃ nihitaṃ ca satye|

satyasya satyamṛtasatyanetraṃ

satyātmakaṃ tvāṃ śaraṇaṃ prapannāḥ|| 26

अर्थ

‘प्रभो! आप सत्यसंकल्प हैं। सत्य ही आपकी प्राप्तिका श्रेष्ठ साधन है। सृष्टिके पूर्व, प्रलयके पश्‍चात् और संसारकी स्थितिके समय—इन असत्य अवस्थाओंमें भी आप सत्य हैं। पृथ्वी, जल, तेज, वायु और आकाश इन पाँच दृश्यमान सत्योंके आप ही कारण हैं। और उनमें अन्तर्यामीरूपसे विराजमान भी हैं। आप इस दृश्यमान जगत‍्के परमार्थस्वरूप हैं। आप ही मधुर वाणी और समदर्शनके प्रवर्तक हैं। भगवन्! आप तो बस, सत्यस्वरूप ही हैं। हम सब आपकी शरणमें आये हैं॥ २६॥

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