श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.3

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

ते पीडिता निविविशुः कुरुपंचालकेकयान्।

शाल्वान् विदर्भान् निषधान् विदेहान् कोसलानपि॥ ३

te pīḍitā niviviśuḥ kurupaṃcālakekayān|

śālvān vidarbhān niṣadhān videhān kosalānapi|| 3

अर्थ

वे लोग भयभीत होकर कुरु, पंचाल, केकय, शाल्व, विदर्भ, निषध, विदेह और कोसल आदि देशोंमें जा बसे॥ ३॥✎ 1652

इस श्लोक और इसके अर्थमें की गयी शुद्धियाँ (1)
  • #1652 पंक्तिके अन्तका योजक-चिह्न: आनन्द-स्वरूप → आनन्दस्वरूप

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