श्रीमद्भागवत महापुराणगीताप्रेस, गोरखपुर — मुखपृष्ठ
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॥ श्रीहरिः ॥

श्लोक 10.2.35

दशम स्कन्ध · अध्याय 2 · अथ द्वितीयोऽध्यायः

सत्त्वं न चेद्धातरिदं निजं भवेद्

विज्ञानमज्ञानभिदापमार्जनम् ।

गुणप्रकाशैरनुमीयते भवान्

प्रकाशते यस्य च येन वा गुणः॥ ३५

sattvaṃ na ceddhātaridaṃ nijaṃ bhaved

vijñānamajñānabhidāpamārjanam |

guṇaprakāśairanumīyate bhavān

prakāśate yasya ca yena vā guṇaḥ|| 35

अर्थ

प्रभो! आप सबके विधाता हैं। यदि आपका यह विशुद्ध सत्त्वमय निज स्वरूप न हो, तो अज्ञान और उसके द्वारा होनेवाले भेदभावको नष्ट करनेवाला अपरोक्ष ज्ञान ही किसीको न हो। जगत‍्में दीखनेवाले तीनों गुण आपके हैं और आपके द्वारा ही प्रकाशित होते हैं, यह सत्य है। परन्तु इन गुणोंकी प्रकाशक वृत्तियोंसे आपके स्वरूपका केवल अनुमान ही होता है, वास्तविक स्वरूपका साक्षात्कार नहीं होता। (आपके स्वरूपका साक्षात्कार तो आपके इस विशुद्ध सत्त्वमय स्वरूपकी सेवा करनेपर आपकी कृपासे ही होता है)॥ ३५॥

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