॥ श्रीहरिः ॥
श्लोक 10.2.37
शृण्वन् गृणन् संस्मरयंश्च चिन्तयन्
नामानि रूपाणि च मंगलानि ते।
क्रियासु यस्त्वच्चरणारविन्दयो-
राविष्टचेता न भवाय कल्पते॥ ३७
śṛṇvan gṛṇan saṃsmarayaṃśca cintayan
nāmāni rūpāṇi ca maṃgalāni te|
kriyāsu yastvaccaraṇāravindayo-
rāviṣṭacetā na bhavāya kalpate|| 37
अर्थ
जो पुरुष आपके मंगलमय नामों और रूपोंका श्रवण, कीर्तन, स्मरण और ध्यान करता है और आपके चरणकमलोंकी सेवामें ही अपना चित्त लगाये रहता है—उसे फिर जन्म-मृत्युरूप संसारके चक्रमें नहीं आना पड़ता॥ ३७॥